विकास में अनुवांशिकता और वातावरण की भूमिका।

विकास में अनुवांशिकता और वातावरण की भूमिका।
अनुवांशिकता और वातावरण

इस आर्टिकल में विकास में अनुवांशिकता और वातावरण की सापेक्ष भूमिका (relative role of heredity and environment in development) के वारे में बताया गया है।

इस आर्टिकल के माध्यम से हम समझेंगे कि किस तरह से व्यक्ति के विकास (Development) में अनुवांशिकता (heredity) और वातावरण (Environment) अपनी भूमिका निभाते हैं।

अनुवांशिकता और वातावरण

विकास में अनुवांशिकता और वातावरण की भूमिका के माध्यम से बच्चे और किशोरों की वृद्धि तथा विकास पर बहुत प्रभाव पड़ता है; तथा बच्चा जन्म से पहले ही बहुत कुछ सीखकर पैदा होता है।

व्यक्ति का यूँ सीखना सिखाना ता-उम्र अथवा मृत्योपरांत तक चलता रहता है।

मनोविज्ञान में सबसे ज्यादा प्रभावशाली तथ्य वृद्धि और विकास है; शिक्षा के उद्देश्य कि प्राप्ति के लिए वृद्धि और विकास की प्रकृति और सिद्धांत का ज्ञान आवश्यक है।

मनोवैज्ञानिक हमेशा सिर्फ एक पक्ष में नहीं हैं; कुछ मनोवैज्ञानिक विकास में अनुवांशिकता (Heredity) को अधिक महत्व देते हैं तो कुछ वातावरण को।

कहा जाता है की समान गुणों वाले बालक का पालन पोषण यदि अलग-अलग वातावरण में किया जाए तो उसके व्यवहार व व्यक्तित्व में परिवर्तन आ जाता है।

इसलिए वंश से ज्यादा अधिक महत्वपूर्ण वातावरण है।

वंशानुक्रम का अर्थ (Meaning of Heredity ):

वंश से अभिप्राय व्यक्ति द्वारा व्यक्तिक गुणों का स्थानांतरण है; वंशानुक्रम (Heredity) में माँ के गर्भधारण के समय से लेकर ९ महीने तक माँ के पेट में ही ये गुण निश्चित हो जाते हैं।

यह गुण बालक अपने माँ-बाप से शारीरिक रूप में प्राप्त करता है; गर्भ के समय DNA की वजह से बच्चा परिवार के किसी भी सदस्य की तरह हो सकता है।

जिसमें नैन-नक्श, लम्बाई, कद, आकार, तथा गुण आदि शामिल होते हैं।

वंशानुक्रम द्वारा बच्चे का विकास उसके माता-पिता के पूर्वजों द्वारा मिली संगत से मिलता है; तथा वह उन्ही गुणों को ग्रहण करता है।अतः यह कहा जा सकता है कि वंश जन्मजात गुणों का योगफल है।

वंशानुक्रम की परिभाषाएं (Definitions of Heredity):

कुछ जीवशास्त्रियों के अनुसार : “निषेचित अंड में उपस्थित विशिष्ट गुणो का योग ही वंशानुक्रम है “

वुडवर्थ के अनुसार : “वंशानुक्रम में से सभी कारक शामिल है जो जीवन शुरू करते समय बालक में विद्यामान थे; अर्थात जन्म के समय नहीं बल की गर्भ धारण करते समय जन्म से लगभग नौ माह पहले।”

रूथ बेनेडिक्ट: “माता–पिता से संतान को हस्तान्तरित होने वाले गुणो को वंशानुक्रम कहते है।”

कुछ अन्य मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शारीरिक तथा मानशिक विषेशताओं का माता और पिता से संतान में आना ही वंशानुक्रम कहलाता है।

इन सभी परिभाषाओं से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रजनन प्रक्रिया द्वारा माता पिता से बच्चों को हस्तांतरित होने वाले गुणों को वंशानुक्रम कहते हैं।

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वंशानुक्रम की प्रकिर्या (procedure of heredity):

वंशानुक्रम (Heredity) की प्रकिर्या माता के गर्भधारण के साथ ही सुरु हो जाती है।

माता-पिता के समागम या मैथून (mating) की क्रिया के द्वारा गर्भधारण होता है; जब स्त्री और पुरुष के जनन अंग (Reproductive organs) आपस में मिलते हैं तो उत्पादक कोशिकाएँ का निर्माण होता है।

युग्मकोष बनते हैं। माता-पिता के मैथून क्रिया के दौरान वीर्य अण्डकोष से संपर्क स्थापित करके निषेचन क्रिया करता है।

और तबसे ही बालक का जीवन शुरू हो जाता है। इस प्रकार से निषेचित रच ( Zygote) तैयार होता है। इस निषेचित क्रिया को ही गर्भधारण होना कहा जाता है।

इस प्रकार औरत नौ मास बाद एक जीवन को जन्म देती है। और उस बच्चे में माता-पिता दोनों के गुणधर्म पाए जाते हैं।

विकास में अनुवांशिकता और वातावरण की भूमिका

बच्चे के वृद्धि और विकास में वंशानुक्रम का सम्बन्ध जनन से होता है। तथा बच्चा अपने माता-पिता से जो कुछ सीखता है वह उसे ही अपने जीवन में अपनाता है। वंशानुक्रम के कुछ नियम हैं जो निम्न हैं –

समान-समान को जन्म देता है/समानता का नियम (law of resemblance )

इससे तात्पर्य है की जैसे माता और पिता होते है वैसी ही उनकी संतान होती है।

इस प्रकार से यदि माता – पिता बुद्धिमान है तो बच्चे भी बुद्धिमान होगें। यदि माता या पिता में कोई कद में छोटा है तो संतान भी कद में छोटे ही पायी जाएगी।

यदि माता या पिता में से कोई रंग में सांवला है तो तो बच्चे भी वैसे ही होंगे। यदि माता या पिता में किसी को मधुमेह या कोई दूसरा रोग है तो इसकी सम्भावना है कि संतान में भी वो रोग पाया जायेगा।

भिन्नता का नियम (Law of variation)

इस नियम से तात्पर्य यह है कि माता-पिता का रंग रूप, कद-काठी जो भी है, संतान उनके समान नहीं होती।

हालाँकि कुछ समानताएं होंगी मगर उनको जान पाना मुश्किल होगा। संतान अपने माता-पिता से भिन्न होगी मगर फिर भी ये वंशानुक्रम से प्रभावित माने जायेंगे।

इस नियम द्वारा यह पाता लगा कि पहला और दूसरा नियम दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं, इसलिए मैडल ने तीसरा नियम बताया था।

प्रत्यागम का नियम (Law of Regression)

इस सिद्धांत का प्रतिपादन तो सोरेन्सन ने किया था। मगर इस सिद्धांत को बाद में मैडल ने अपना लिया।

सोरेन्सन ने इसके लिए कहा कि तीव्र बुद्धि वाले माता – पिता के बच्चे की बुद्धि कम तीव्र हो सकती है।

और प्रतिभाशाली माता – पिता के बच्चे कम प्रतिभाशाली हो सकते हैं। अतः यही प्रवृति प्रत्यागम कहलती है।

वातावरण (Environment)

यह शब्द अंग्रेजी के environment शब्द का हिंदी रूपांतरण है। इस शब्द को पर्यावरण का पर्यायवाची भी कहा जा सकता है।

दरअसल हमारे आस पास जो भी है वो सब हमारे वातावरण का ही हिस्सा है।

हमारे वातावरण का हमारे जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है; और यह भी कहा जा सकता है कि हम जिस तरह के वातावरण में रहते हैं असल में वैसे ही बन जाते हैं।

कई मनोवैज्ञानिकों ने माना है कि वातावरण भी मनुष्य के भविष्य को निर्धारित करने वाला एक कारक है।

एक मनोवैज्ञानिक वॉटसन ने तो यहाँ तक कह दिया कि “तुम मुझे एक नवजात शिशु दो, मैं उसे डॉक्टर, वकील या चोर जो चाहे बना दूंगा”।

हम कई कहानियों में भी पढ़ते हैं कि संगत का असर बहुत जल्दी होता है। और इस बात को झुटलाया नहीं जा सकता।

अतः हमारे जीवन के निर्धारण में वातावरण का बहुत अधिक योगदान होता है।

वातावरण की परिभाषाएं

रॉस के अनुसार “वातावरण एक बाहरी शक्ति है जो हमें प्रभावित करती है। “

वुडबर्थ वातावरण को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि “वातावरण में वे समस्त वाह्य तत्त्व आ जाते हैं जिन्होंने जीवन प्रारम्भ करने के समय से व्यक्ति कि प्रभावित किया है”

जिसवर्ट के अनुसार “जो किसी वास्तु को चारों ओर से घेरे हुए है और उसपर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है वह वातावरण होता है।”

भूमिका (Introduction):

कई मनोवैज्ञानिक वातावरण (Environment) का समर्थन करते हैं तथा कई इसका विरोध भी करते हैं।

वातावरण का समर्थन करने वाले मनोवैज्ञानिक व्यवहारवादी हैं; और मानते हैं की बालक एक कोरी स्लेट की तरह है जिसपर कुछ भी लिखा जा सकता है।

अर्थात बालक को वंश में जो मिला वो उसके साथ रहता है मगर उसके आसपास के वातावरण के मुताबिक उसमें कई बदलाव आते रहते हैं। और यह एक सतत प्रकिर्या है जो उम्रभर चलती रहती है।

अनुवांशिकता (वंश) और वातावरण के शैक्षिक महत्व

वंश के आधार पर बच्चों की प्रकृति और बुद्धि का पता लगाया जा सकता है। इस प्रकार उसको शिक्षा देते समय उन बातों को ध्यान में रखा जा सकता है। जिससे की शिक्षा का हर बच्चे को पूर्ण लाभ मिल सके।

यदि अध्यापक को पता लगे कि कोई बालक बौद्धिक रूप से कमजोर है तो उसको समुचित वातावरण प्रदान किया जा सकता है।

अध्यापक को बच्चे की पृष्ठभूमि से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। और उनके साथ निष्पक्ष व्यव्हार करना चाहिए जिससे कि हर बालक को शिक्षा ग्रहण करने में सामान दर्जा मिल सके।

वंश के द्वारा मिले गुणों को जानकर शिक्षक बच्चे की योग्यताों और क्षमताओं में निखार ला सकता है और वृद्धि कर सकता है।

वंश कि द्वारा प्राप्त किसी कमी को ध्यान में रखकर शिक्षक बच्चे के लिए शिक्षा ग्रहण हेतु उचित वातावरण का प्रबंध कर सकता है।

बालक की बौद्धिक क्षमताओं को जानकार उसको सही मार्गदर्शन कर पाना आसान हो जाता है।

वातावरण और वंशानुक्रम का विकास पर प्रभाव

वंशानुक्रम का प्रभाव व्यक्तिओं के संपूर्ण जीवन के विकास पर निश्चित रूप से पड़ता है।

परिवारों के अध्ययन :

परिवारों के अध्यन में गाल्टन द्वारा किये गए अध्ययनों (Galton’s studies) को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

वंशानुक्रम का प्रभाव देखने के लिए जुड़वां बच्चों पर भी अध्ययन किये गए।

जिसमे यह पाया गया कि जिस परिवार के पूर्वज मन्द बुद्धि के होते हैं। उनकी सन्तान भी मन्द बुद्धि ही होगी।

डगडेल ने अपने इस अध्ययन में एक परिवार का अध्ययन किया; उस परिवार का मुखिया एक आवारा और अशिक्षित व्यक्ति था; और उसने एक बाजारू स्त्री से विवाह किया था।

उस परिवार में हत्यारे अपराधी चोर चरित्रहीन स्त्री और भिखमंगे शामिल थे; और वो सैकड़ों सालों तक इसी तरह तरह से रहे।

हालांकि उस परिवार के कुछ लोग कहीं दूर जाकर बस गए थे। परन्तु फिर भी उस परिवार में वही दोष पाए गए ।

जुड़वाँ का अध्ययन :

इस अध्ययन में कुछ जुड़वां बच्चों पर अध्ययन हुआ; उनमें कुछ ऐसे बालक थे जिनका लालन पालन एक ही साथ हुआ।

और कुछ ऐसे बालक जिनका लालन पालन विभिन्न वातावरण में हुआ।

इस अध्ययन मे उन्होने दोनो प्रकार के समान जुड़वा बच्चों की बुद्धि की जाँच की; और पाया कि एक साथ पलने वाले बच्चों की बुद्धि–लब्धि में पाँच या छः ईकाइयों का अन्तर था।

जबकि दूसरे जिनका लालन पालन अलग अलग वातावरण में हो रहा था; बच्चों की बुद्धि – लब्धि में आठ या नौ का अन्तर था।

रक्तसंबन्धों का अध्ययन :

इस अध्ययन में सामान खून या एक ही खानदान के रिश्तेदारों पर शोध की गयी।

जिसमें पाया गया कि खून के रिश्तों में कुछ विशेषताएं सामान मिलीं। मगर वातावरण का भी उनपर प्रभाव पाया गया।

निष्कर्ष

उपर्युक्त तथ्यों से यह निष्कर्ष निकलता है किबच्चों के विकास पर अनुवांशिकताऔऱ वातावरण दोनों का प्रभाव पड़ता है।

और बच्चों का विकास इन दो चीज़ों से ही निर्धारित होता है।

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