कोहलबर्ग (Kohlberg) के नैतिक विकास(Moral Development) का सिद्धांत (Theory)।

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Kohlberg's Theory Of Moral Development
Kohlberg’s Theory Of Moral Development

कोहलबर्ग के नैतिक विकास का सिद्धांत (Kohlberg’s Theory Of Moral Development) विषय CTET, और B.Ed दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस article में हम उन सभी सवालों पर चर्चा करेंगे जो इस कोहलबर्ग के नैतिक विकास का सिद्धांत (Kohlberg’s Theory Of Moral Development) topic से पूछे जा सकते हैं। MDU, CRSU, और बाकी संस्थानों की परीक्षाओं में यह कोहलबर्ग का सिद्धांत (Kohlberg’s Theory)16 marks का पूछा जाता है। आपको पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए किस तरह कोहलबर्ग का नैतिक विकास (Kohlberg’s Theory Of Moral Development) का उत्तर देना चाहिए यह भी इस article में बताया गया है।

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Content in this article

कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत का वर्णन कीजिये।

(Describe Kohlberg’s theory of Moral Development.)

OR

नैतिक विकास क्या है? कोहलबर्ग द्वारा प्रतिपादित नैतिक अवस्थाओं का विवेचन करें।

(What is moral development? Explain the stages of moral development as given by Kohlberg.)

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भूमिका

बच्चे में नैतिक व्यवहार जन्मजात नही पाया जाता अर्थात बच्चा नैतिकता के सम्प्रत्यय से अपरिचित होता है। इस व्यवहार को बच्चा सामाजिक परिधि से सीखता है। वह अपने आस–पड़ोस तथा स्कूल में ही नैतिकता सीखता है। वह प्रारम्भ में पुरस्कार, दण्ड, प्रशंसा तथा निंदा के माध्यम से अच्छे आचरण सम्पन करता है ।वह बुरे आचरणों को त्याग देता है तथा किशोरावस्था में अपने भीतर विवेक पैदा करता है। मनोवैज्ञानिकों ने इस बात पर अध्ययन के प्रयत्न किये हैं कि किस प्रकार बालक नैतिक व्यवहार को प्रदर्शित करने लगता है।  नैतिक क्षमता के विकास के सन्दर्भ में सभी मनोवैज्ञानिकों के सामान मत नहीं हैं। नैतिक विकास पर विभिन्न वैज्ञानिकों ने अपने सिद्धांत दिए हैं जिनमें पियाजे और कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत प्रमुख हैं।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि जो व्यकित अपने समाज की मान्यताओं के अनुसार आचरण करता है वह नैतिक कहलाता है। और इसके विपरित अनैतिक कहलता है।

नैतिक विकास की परिभाषाएं

सियर्स ने बालकों के नैतिक विकास पर समाजीकरण और शिशुपालन विधियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। 

बैन्डूरा और वाल्टर्स ने बताया कि बच्चे में नैतिक विकास सामाजिक अधिगम का परिणाम होता है।  बच्चा अपने परिवेश में नित्य नमूनों के व्यवहार का अनुसरण  कर नैतिक आचरण ग्रहण करता है।  यहाँ नमूनों से अभिप्राय है माता – पिता , बड़े- भाई – बहन या अध्यापक आदि जिन्हें बच्चा अनुकरणीय समझता है। 

स्किनर ने अधिकतर प्रबलन का प्रभाव प्रदर्शित करते हुए बताया है कि नैतिक व्यवहार का विकास , दंड एवं पुरस्कार निर्भर होता है।

फ्रॉयड के अनुसार जब बच्चा माता-पिता कि भावनाओं और अभिवृतियों को उनसे ग्रहण करता है तथा उनसे ग्रहण की हुई नैतिकता ही आगे चलकर उसके लिए विवेक का रूप धारण कर लेती है।  बालक नैतिक आचरण के लिए भीतर से निर्देशित होता है।  इसे फ्रॉयड ने नैतिक विकास में व्यक्ति की बाल्यकालीन अनुभूतियों का महत्वपूर्ण बताया है।

सभी वैज्ञानिकों द्वारा दी गयीं परिभाषाओं से यह ज्ञात होता है कि उनके द्वारा दिए गए सिद्धांत कोहलबर्ग के सिद्धांत से अलग थे। कोहलबर्ग के सिद्धांत का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार से है:

कोलबर्ग के सिद्धांत की मूलभूत मान्यताएं

(Basic assumptions of Kohlberg’s Theory)

  • बालक के नैतिक विकास को समझने के लिए उनके तर्क और सिद्धांत के स्वरुप का विश्लेषण करना आवश्यक है। बच्चे द्वारा प्रदर्शित प्रतिक्रियाओं के आधार पर इसकी नैतिकता का सही अनुमान लगा पाना नामुमकिन है। अधिकतर परिस्थितियों में बच्चा भय या पुरस्कार के प्रलोभन में वांछनीय व्यवहार प्रदर्शित करता है। कोलबर्ग ने बालक को किसी धर्मसंकट की स्तिथि में रखकर यह देखा है कि वह उस परिस्थिति में क्या सोचता है। तथा किस तर्क के आधार पर उचित व्यवहार के लिए निर्णय लेता है।
  • कोलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत को ‘अवस्था सिद्धांत‘ भी कहा जाता है।  उन्होंने सम्पूर्ण नैतिक विकास को छः अवस्थाओं में बांटा है। उनके अनुसार सभी बच्चे इन अवस्थाओं में से गुज़रते हैं।  नैतिक विकास की यह अवस्थाएं एक निश्चित क्रम में आती हैं। इस क्रम को बदला नहीं जा सकता।  नैतिक विकास की प्रत्येक अवस्था में पाई जाने वाली नैतिकता का गुण अन्य अवस्थाओं की नैतिकता से अलग होता है। और प्रत्येक अवस्था में बालक की तर्क शक्ति नए प्रकार की होती है।
  • बच्चा एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करता है। उस बच्चे के भीतर नैतिक व्यवहार गुणात्मक परिवर्तन कब और कैसे उत्पन्न होते हैं , यह एक विचारणीय प्रश्न है। कोलबर्ग के अनुसार नैतिक व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन क्रमिक रूप से ही आते हैं।  अचानक ही पैदा नहीं हो जाते। अर्थात किसी अवस्था विशेष में पहुँचने पर बालक केवल उसी अवस्था की विशेषताओं का ही प्रदर्शन नहीं करता । बल्कि उसमे कई अवस्थाओं के व्यवहार मिश्रित रूप से दिखाई पड़ते हैं।
  • इलियट टूरियल (कोलबर्ग के एक सहयोगी) के अनुसार सभी बच्चे नैतिक विकास की एक अवस्था के बाद दूसरी अवस्था के प्रविष्ट होता है। परन्तु सभी बालक छः अवस्थाओं तक नहीं पहुँच पाते। अतः नैतिक विकास की अंतिम अवस्था तक पहुँचने वाले बालकों की संख्या बहुत काम होती है।

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नैतिक विकास की अवस्थाएं

कोहलबर्ग ने नैतिक विकास की कुल छः अवस्थाओ का वर्णन किया है। इन्होंने दो – दो अवस्थाओ को एक साथ रखकर उनके तीन स्तर बना दिए है । अतः वे तीन स्तर निम्न है-

1. प्री - कन्वेंशनल (Pre-Conventional)
2. कन्वेंशनल (Conventional)
3. पोस्ट कन्वेंशनल (Post-Conventional)

1. प्री – कन्वेंशनल स्तर (Pre-Conventional Level):

जब बालक किन्हीं बाहरी घटनाओं के सन्दर्भ में किसी आचरण को नैतिक अथवा अनैतिक मानता है। तो उसकी यह नैतिक तर्कशक्ति प्री – कन्वेंशनल स्तर की कही जाती है। इस स्तर के अंतर्गत निम्नलिखित दो अवस्थाएं आती है-

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a) आज्ञा एवं दंड की अवस्था
b) अहंकार की अवस्था

a) आज्ञा एवं दंड की अवस्था

  • इस अवस्था में बच्चों का चिंतन दंड देने से प्रभावित होता है।
  • अक्सर परिवार के बड़े सदस्य बच्चे को कुछ कार्य करने के आदेश देते रहते हैं।
  • इन आदेशों का पालन ना करने पर पर उसे दण्डित किया जाता है।
  • इस तरह की परिस्तिथियों में बच्चे को दंड से बचने के लिए आज्ञा का पालन करना पड़ता है।
  • छोटी आयु में बच्चा किसी कार्य को करने या न करने का निर्णय इसलिए लेता है।
  • क्योंकि उसे दंड का भय होता है।
  • अतः नैतिक विकास की शुरू की अवस्था में दंड को बच्चों की नैतिकता का मुख्या आधार माना जाता है।

b) अहंकार की अवस्था

  • कोहलबर्ग के अनुसार इस उप-अवस्था में बालक के चिंतन का स्वरुप बदल जाता है।
  • आयु में वृद्धि होने के परिणाम स्वरुप बच्चा अपनी आवश्यकताओं को अच्छी तरह से समझने लगता है।
  • उसके द्वारा किये जाने वाले ज्यादातर कार्यों से उसकी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं।
  • उसकी इच्छाओं के पूरे होने के तरीके अलग होते हैं।
  • अगर कोई इच्छा झूट बोलने से पूरी होती है तो वह झूठ बोलना उचित समझेगा।
  • भूखे रहने पर किसी वस्तु को चुराकर खाने को वह नैतिक समझेगा।
  • नैतिक विकास की इस अवस्था का आधार बालक का अहंकार और आवश्यकताएं उसकी तर्क शक्ति का आधार बन जाते हैं।

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2. कन्वेंशनल स्तर (Conventional Level)

कन्वेंशनल स्तर की अवस्था को भी दो उप अवस्थाओं में बनता गया है जो इस प्रकार हैं-

a) प्रशंसा की अवस्था ( Stage of Appreciation)
b) सामाजिक व्यवस्था के प्रति सम्मान की अवस्था (Stage of Respect for social system)

a) प्रशंसा की अवस्था(Stage of Appreciation)

  • इस अवस्था में बच्चा किसी कार्य को इसलिए करता है, ताकि दूसरे लोग उसकी प्रशंसा करें।
  • बच्चे इस अवस्था में निंदनीय आचरण से बचने के प्रयास में रहते हैं।
  • इस अवस्था में बच्चा सामाजिक प्रशंसा और निंदा के महत्व को समझने लगता है।
  • दूसरी ओर समाज के सदस्य बच्चों से विशिष्ठ भूमिकाओं की अपेक्षा करते हैं।
  • जब बच्चे इन भूमिकाओं का निर्वाह अच्छे से करते हैं तो समाज से उन्हें स्वीकृति मिलने लगती है।
  • इस अवस्था के दौरान उन्ही व्यवहारों को बच्चे उचित और नैतिक मानते हैं-
  • जिनके लिए वे परिवार, स्कूल, पड़ोस, और मित्रों आदि से प्रशंसा या मान्यता प्राप्त करते हैं।
  • अतः हम कह सकते हैं कि इस अवस्था में बच्चे के चिंतन का स्वरुप समाज या उसके परिवेश से होता है।

b) सामाजिक व्यवस्था  के प्रति सम्मान कि अवस्था

  • कोलबर्ग के अनुसार,समाज के अधिकाँश सदस्य नैतिक विकास की इस अवस्था तक पहुँच जाते है।
  • यह अवस्था बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है।
  • इस अवस्था से पहले बच्चा समाज को इसलिए महत्वपूर्ण मानता था कि समाज से उसको स्वीकृति या प्रशंसा मिलती थी।
  • लेकिन इस अवस्था में प्रवेश करने के बाद वह समाज को स्वयं में एक लक्ष्य मानने लगता है।
  • वह समाज कि प्रथाओं, परम्पराओं और नयमों में आस्था विकसित करके समाज के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करता है।
  • बच्चा यह सोचने लगता है कि उसे अच्छा कार्य इसलिए करना चाहिए क्योंकि यह उसका कर्तव्य है।
  • और सामाजिक नियमों के विरुद्ध किया गया गर कार्य अनैतिक होगा।

3. पोस्ट कन्वेंशनल स्तर (Post-Conventional Level)

कोहलबर्ग ने इस स्तर को भी तीन उप अवस्थाओं में बांटा है जो निम्न प्रकार से हैं-

a) सामाजिक समझौते की अवस्था (Stage of social contract)
b) विवेक की अवस्था (Stage of Conscience) 

a) सामाजिक समझौते की अवस्था (Stage of social contract)

  • इस अवस्था में प्रवेश करने पर बच्चे के नैतिक चिंतन कि दशा में पर्याप्त परिवर्तन आ जाते हैं।
  • अब वह स्वीकार करके चलता है कि व्यक्ति और समाज के बीच एक समझौता होना अनिवार्य है।
  • इसी के साथ वह पारम्परिक लेन-देन में विश्वाश करने लगता है।
  • उसको लगने लगता है कि व्यक्ति को सामाजिक नियम इसलिए स्वीकार करने चाहिए।
  • और उनका सम्मान इसलिए करना चाहिए क्योंकि समाज व्यक्ति के हितों कि रक्षा करता है।
  • अब व्यक्ति अब यह सोचने लगता है कि चोरी आदि अनैतिक करए होते हैं ऐसा करने से समाज और व्यक्ति के बीच का समझौता टूट जाता है।

b) विवेक कि अवस्था (Stage of Conscience)

  • यह अवस्था नैतिक विकास कि अंतिम अवस्था है।
  • इस अवस्था में पहुँचने पर व्यक्ति का दृष्टिकोण भी विकसित करने सफल हो जाता है।
  • इस अवस्था में व्यक्ति में विवेक जाग जाता है।
  • अब व्यक्ति के उचित-अनुचित तथा अच्छे-बुरे, आदि के बारे में अपने व्यक्तिगत विचार विकसित हो जाते हैं।
  • अतः इस व्यवस्था में पहुंचकर व्यक्ति सामाजिक नियमों की व्याख्या अपने स्वयं के दृष्टिकोण के अनुसार करने लगता है।
  • अगर नियम उसके विवेक से मेल नहीं खाते तो वह नियमों कि वैधता को भी चुनौती तक दे देता है।
  • अंततः वह अपने विवेक के सहारे जीवित रहने का आदि हो जाता है।

निष्कर्ष

अधोलिखित के अनुसार कहा जा सकता है कि नैतिक व्यवहार को बच्चा सामाजिक परिधि और आस–पड़ोस में सीखता है। वह प्रारम्भ में पुरस्कार, दण्ड, प्रशंसा तथा निंदा के माध्यम से अच्छे आचरण सम्पन करता है । बालक कई स्तरों और अवस्थाओं से गुजरता है। हर अवस्था में बालक का व्यवहार और मान्यताएं अलग हो सकती हैं। कभी वह झूठ बोलना उचित समझता है तो कभी चोरी करना। कभी उसको अपनी प्रशंशा अच्छी लगने लगती है। पर जैसे-जैसे वह समाज में उठने-बैठने लगता है उसकी मान्यताओं में बदलाव आने शुरू हो जाते हैं। अंततः उसमें विवेक की अवस्था पैदा हो जाती है। अब उसको उचित-अनुचित तथा अच्छे-बुरे, आदि का ज्ञान हो जाता है। और वह विवेक के सहारे जीवन जीने लगता है।

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