ज्ञान प्राप्ति के स्रोत (Sources Of Knowledge)

ज्ञान प्राप्ति के स्रोत
ज्ञान प्राप्ति के स्रोत

इस आर्टिकल में हम ज्ञान प्राप्ति के स्रोत (sources of knowledge) या ज्ञान प्राप्ति के विभिन्न स्रोतों के बारे में चर्चा करेंगे। ज्ञान प्राप्ति के स्रोत (sources of knowledge) के इस टॉपिक के माध्यम से आप सीख पाएंगे कि आखिर किन साधनों के द्वारा ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है।

ज्ञान के कौन-कौन से स्त्रोत हैं? व्याख्या कीजिये।

(What are the sources of knowledge? Explain.)

ज्ञान क्या है?

ज्ञान से अभिप्राय किसी भी वस्तु को पूरी तरह से समझने, उसका अनुभव करने तथा समय आने पर उसका प्रयोग करने से है।

हम सूचना को ज्ञान नहीं कह सकते। ज्ञान से सम्बंधित पूरी जानकारी के लिए आप यह (ज्ञान तथा सूचना में अंतर) आर्टिकल पढ़ सकते हैं।

स्त्रोत का अर्थ

वह वस्तु जिससे किसी अन्य वस्तु की उत्पत्ति होती है, स्रोत कहलाती है। किसी वस्तु के उद्गम (उत्पत्ति) के स्थान को ही स्त्रोत कहते हैं। यह वह स्थान होता है जहाँ से कोई पदार्थ प्राप्त होता है।

ज्ञान प्राप्ति के स्रोत

ज्ञान के मुख्य स्त्रोत इस प्रकार हैं-

1. इन्द्रिय अनुभव (Sense Experience)

ज्ञान को मुख्यतया आँख, कान,नाक, जीभ व् त्वचा जैसी ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त किया जाता है। इन इन्द्रियों को ज्ञान का आरंभिक स्त्रोत कहा जाता है।

हमारी इन्द्रियों के किसी बाहरी वस्तु के संपर्क में आने से हमें उसकी संवेदना होती है। इसी संवेदना के आधार पर ज्ञान का प्रत्यय हमारे मस्तिष्क में बनता है। इसी वजह से इन्द्रियों को ज्ञान का स्त्रोत कहा जाता है।

उदाहरण के तौर पर, हम जानते हैं कि ‘अंग्रेज गोरे होते हैं’, हाथी बड़ा होता है, भैंस काले रंग की होती है।

यह सब हमारे विश्वासों का ही स्त्रोत यह है जो इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त होता है।

अक्सर इन्द्रिय अनुभव को ज्ञान के स्त्रोत के रूप में स्वीकार कर लेने की आलोचना भी की जाती है। क्योंकि कई बार भ्रम के कारण व्यक्ति वस्तु की सही पहचान नहीं कर पाता।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यह आलोचना ठीक नहीं है।

क्योंकि भ्रम को हमारी इन्द्रियाँ के द्वारा ही दूर किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि भ्रम के कारण हमारी आँखें, रस्सी को सांप समझ लें तो इस तरह के भ्रम को दूर करने के लिए आँखों का ही सहारा लेना पड़ेगा।

2. तर्क (Reasoning)

तर्क ज्ञान का एक स्त्रोत है। इसके द्वारा पूर्व ज्ञान के आधार पर नए ज्ञान तक पहुंचा जाता है। तर्क के द्वारा बुद्धि का इस्तेमाल होता है और इस प्रकार ज्ञान प्राप्त होता है।

इस प्रकिर्या से बुद्धि में कुछ तथ्य पनपते हैं। इन तथ्यों के आदान प्रदान से ज्ञान प्राप्त होता है।

तर्क को दो भागों में बांटा जाता है-

  1. आगमन तर्क (Inductive Reasoning)
  2. निर्गमन तर्क (Deductive Reasoning)

a) आगमन तर्क

इस तर्क के अंतर्गत हमारे द्वारा लिया गया आधार सत्य होने पर भी निष्कर्ष अलग हो सकते हैं।

हम अगर कहें कि “अंग्रेज गोरे होते हैं’ तो इसका निष्कर्ष यह नहीं निकाला जा सकता कि सभी अंग्रेज गोरे ही होंगे।

हो सकता है कुछ अंग्रेज साँवले भी हों।

b) निर्गमन तर्क

इस तर्क के अंतर्गत अगर हमारे द्वारा लिया गया आधार सत्य है तो निष्कर्ष अवश्य ही सत्य होगा।

उदाहरण के तौर पर अगर कहा जाए कि जिस ग्रह पर पानी है सिर्फ वहीँ जीवन है। तो इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मंगल ग्रह पर इसलिए नहीं रहा जा सकता क्यूंकि वहां पानी नहीं है।

3. तर्क बुद्धि (Rational Intelligence)

हमारे जीवन में होने वाले अनुभवों से हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह ज्ञान ही तर्क में परिवर्तित हो जाता है।

तर्क बुद्धि के माध्यम से व्यक्ति दो कथनों के बीच सम्बन्ध को समझता है। प्रत्यय (Concept) निर्माण इसी आधार पर होता है।

4. शब्द या आप्त वचन (Verbal Testimony or Authority)

अक्सर हमें ऐसे ज्ञान के लिए विशेषज्ञों पर निर्भर रहना पड़ता है। क्योंकि उनके पास ज्ञान देने हेतु विशेषज्ञता होती है।

इस तरह के ज्ञान को प्रदान करने वाले अलग अलग विशेषज्ञ होते हैं। जैसे गणित का ज्ञान सिर्फ गणित के विशेषज्ञ से लिया जाना उचित है।

उसी प्रकार संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत पियाजे ने दिया है यह हमें आप्त वचन के माध्यम से ज्ञात हुआ है।

इसे विशेषज्ञों के वचन भी कहा जा सकता।

5. श्रुति (Revelation)

इसका सम्बन्ध धार्मिक ज्ञान से होता है। श्रुति शब्द से अभिप्राय सुनने या प्रकट होने से है।

विभिन्न धर्म ग्रंथों के विषय में यह धारणा है कि उनके प्रवर्तकों ने उनमें वर्णित ज्ञान को अपनी ज्ञान की आँखों से देखा है।

अथवा वह ज्ञान उनके सामने प्रकट हुआ है।

इस रूप में श्रुति को ज्ञान का स्त्रोत कहा जाता है। अतः धार्मिक ज्ञान के लिए श्रुति एक महत्वपूर्ण स्त्रोत है।

6. अन्तः प्रज्ञा (Intuition)

यह ज्ञान एक प्रकार से अन्तःकरण की आवाज है। अन्तः प्रज्ञा का सम्बन्ध आभास या अंतर्बोध से है। यह एक ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा व्यक्ति को परम सत्य का बोध होता है।

हमारे अंतःकरण की आवाज से एक ज्ञान का अनुभव होता है। इस अनुभव को छटी इंद्री के कारण प्राप्त ज्ञान भी कहा जा सकता है।

इस ज्ञान को भाषा के द्वारा प्रकट करने में कठिनाई आती है। सामान्य व्यक्ति के लिए इस प्रकिर्या द्वारा ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं है।

सिर्फ परमसिद्ध योगी ही इस स्त्रोत से ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं।

7. आस्था (Faith)

आस्था का मतलब है – लगाव। हमारी संस्कृतियों में कुछ ऐसी बातें होती हैं जिनपर हमारी आस्था होतीं हैं।

यह आस्था इसलिए होती है क्योंकि वह परंपरागत रूप में प्राचीन काल से ही चली आ रही है।

हमारे सामाजिक जीवन में अनेक कार्य हमारी आस्था से जुड़े होते हैं। अतः आस्था को ज्ञान का महत्वपूर्ण स्त्रोत माना जा सकता है।

8. प्रकृति

प्रकृति भी ज्ञान प्राप्ति का प्रमुख स्त्रोत है। प्रत्यके व्यक्ति अपनी योग्यतानुसार प्रकृति से बहुत कुछ सीखता है।

जैसे- फलदार वृक्ष सदैव झुका रहता है। वह पतझड वृक्ष की तरह नहीं रहता और पक्षियों को छाया देता है।

सूर्य ब्रहृमाण्ड का चक्कर लगाता है तथा पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है।

उन सभी चीजों से हम सीखते है कि किस प्रकार से अपना जीवन ठीक से चला सकेगें।

9. पुस्तकें (Books)

पुस्तकें भी ज्ञान का एक प्रमुख स्त्रोत मानी जाती हैं। हमारे पूर्वज हमेशा से ताम्रपत्र, पत्थर तथा भोज पत्रों पर आवश्यक बाते लिखते आ रहे हैं।

हमने उनसे काफी कुछ सीखा है। अगर पुस्तकें न होतीं तो हमें काफी बातों का ज्ञान नहीं हो पाता।

हरप्पा की सभ्यता की जानकारी हो या मोहनजोधरो की, हमें ज्यादातर बातें लिखित रूप में ही मिली हैं। जिसके वजह से हमें ज्ञान प्राप्ति में आसानी हुई है।

आज के युग में प्रत्येक विषय पर हमें किताबे मिल सकती हैं। यह ज्ञान का भण्डार होती हैं।

आशा करते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के स्रोत (Sources Of Knowledge) आधारित यह आर्टिकल आपको पसंद आया होगा। आप अगर हमें अपना सुझाव देना चाहते हैं या फिर कोई जानकारी चाहते हैं तो हमें यहाँ संपर्क कर सकते हैं।

महत्वपूर्ण पुस्तकें,

B.Ed फाइल्स,

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