संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त (Cognitive Development Theory)

संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त
संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त

संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त : संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत (Theory Of Cognitive Development) के इस आर्टिकल में हम जीन पियाजे (Jean Piaget) द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत पर प्रकाश डालेंगे।

यह संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत (Theory Of Cognitive Development) का टॉपिक कई परीक्षाओं CTET, UPTET, MPTET, Other TETs आदि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

We are available on YouTube now! Shower some more love and connect with us on YouTube.

To visit our YouTube Channel, Click Here!

संज्ञान (cognition)

Content in this article

संज्ञान से तात्पर्य मन की उन आन्तरिक प्रक्रियाओं और उत्पादों से है, जो जानने की ओर ले जाती हैं।

इसमें सभी मानसिक गतिविधियाँ शामिल रहती हैं- ध्यान देना, याद करना, सांकेत करना, वर्गीकरण करना, योजना बनाना, समस्या हल करना और कल्पना करना।

निश्चित ही हम इस सूची को आसानी से बढ़ा सकते हैं क्योंकि मनुष्यों के द्वारा किये जाने वाले लगभग किसी भी कार्य में मानसिक प्रक्रियाएँ शामिल हो जाती हैं।

संज्ञानात्मक विकास (cognitive Development)

संज्ञानात्मक विकास का अर्थ है – मस्तिष्क का विकास। मनुष्य के मस्तिष्क का विकास उसकी उम्र के साथ- साथ होता है।

पियाजे द्वारा प्रतिपादित संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त (Jean Piaget’s theory of cognitive development) मानव बुद्धि की प्रकृति एवं उसके विकास से सम्बन्धित एक सिद्धान्त है।

प्याज़े का मानना था कि व्यक्ति के विकास में उसका बचपन एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

जीन प्याज़े कौन थे?

प्याज़े स्विट्ज़रलैंड निवासी एक मनोवैज्ञानिक थे; उन्होंने खुद के बच्चो को अपने अध्यन का विषय बनाया था। उन्होंने लम्बे अध्यन के बाद संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत को प्रतिपादित किया। (Watch this video to know more about Piaget)

प्याजे ने व्यापक स्तर पर संज्ञानात्मक विकास का अध्ययन किया; पियाजे के अनुसार, बालक द्वारा अर्जित ज्ञान के भण्डार का स्वरूप विकास की प्रत्येक अवस्था में बदलता हैं और परिमार्जित होता रहता है।

जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को दो स्वरूपों में बांटा है-

  1. संज्ञानात्मक संरचना (Cognitive Structure)
  2. संज्ञानात्मक कार्यप्रणाली (Cognitive Functioning)

1. संज्ञानात्मक संरचना (Cognitive Structure):

मानव शिशु में मूलभूत प्रविर्तियों के रूप में शीमाज (schema) आदि से सम्बंधित योग्यताएं पायी जाती हैं; शीमाज की मदद से बच्चा गामक (Touch) क्रियाओं को करता है।

अगर हम बच्चे की आदत की बात करें तो बच्चा हर चीज को मुँह में लेकर चूसना शुरू कर देता है ;जिसका सम्बन्ध उसकी मानसिक संरचना से है जो संज्ञानात्मक विकास में सहायता प्रदान करती है।

 2. संज्ञानात्मक कार्यप्रणाली (Cognitive Functioning):

पियाजे ने मष्तिस्क की कार्यप्रणाली को मुख्यतया तीन प्रकिर्याओं पर आधारित बताया जो की इस प्रकार हैं; आत्मसातीयकरण व समयोजीकरण तथा सन्तुलनीकरण।

आत्मसातीयकरण( Assimilation)

इस प्रकिर्या में बालक जन्म से कुछ क्रियाएं सीमाज (schema) के रूप में प्राप्त करता है; इस सन्दर्भ में जो कुछ भी पुराना अनुभव बालक के पास है उसका प्रयोग नवीन परिस्थितियों का सामना करने के लिए करता है।

उदाहरण के लिए- सीढ़ियां उतारते वक़्त अगर बालक एक बार गिर गया तो वो अगली बार बैठ कर उतरता है।

समयोजीकरण (Accommodation)

इसका अभिप्राय नयी परिशतितियों से निपटने के लिए किये जाने वाली नयी प्रकिर्याओं से है।

जैसे बालक का बैठ कर सीढ़ी उतरना इसी प्रकार बालक का बौद्धिक कार्यों को करने के लिए अलग अलग तरीकों का अपनाना संज्ञानात्मक वृद्धि विकास का परिचायक है।

सन्तुलनीकरण (Equilibrium)

जीन पियाजे ने कहा की बालक को अपनी नयी परिशतितियों से समायोजन करना पड़ता है। जिसके लिए संतुलन बनाना जरूरी है। यह संतुलन बालक आत्मसातीयकरण तथा समायोजन के द्वारा विकसित करता है।

पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अवधारणाएं (Stages of cognitive development):

पियाजे ने बालक में होने वाले संज्ञानात्मक विकास को स्पष्ट करने के लिए संज्ञानात्मक संरचना और उसकी कार्यप्रणाली जैसी अवधारणा को सामने रखा; उन्होंने बताया कि बड़े होने के साथ साथ बौद्धिक योग्यताओं में परिवर्तन आने लगता है।

संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएं

१. संवेदनात्मक गामक अवस्था (sensory motor Stage)

यह अवस्था जन्म से दो वर्ष तक होती है; इस अवस्था में बालक की मानसिक क्रियाएं इन्द्रिय जनित गामक क्रियाओं के रूप में विकसित होती हैं।
बालक का बौद्धिक विकास उसके द्वारा की जाने वाली गतिविधिओं द्वारा देखा जा सकता है; देखना, छूना, व चूसना जैसी क्षमताओं का प्रयोग बालक अपने उद्देश्य प्राप्त करने के लिए करता है।

उदहारण के लिए – बालक के सामने से यदि उसका खिलौना हटा लिया जाए तो वह उसे खोजने का प्रयास करता है।

इस अवस्था में बालक भाषा के अभाव के कारण चारो ओर के वातावरण को इन्द्रियों के माध्यम से जानने कि कोशिश करता है।

वह अपने भावों को गामक क्रियाओं के माध्यम से व्यक्त करने कि कोशिश करता है।

२. पूर्व क्रियात्मक अवस्था (Preoperational stage)

यह अवस्था २ वर्ष से ७ वर्ष तक की आयु के बच्चो कि अवस्था है। बालक का संज्ञानात्मक विकास दो अन्य अवस्थाओं में होता है-

२ से ४ वर्ष तक के विकास कि अवस्था

इस अवस्था में बालक का भाषाई ज्ञान विकसित होना प्रारम्भ हो जाता है; बालक में वश्तुओं का विभेदीकरण, पहचान की क्रियाएँ विकसित हो जाती हैं।

बालक सभी वस्तुओं पर अपना अधिकार समझता है; माता पिता पर भी धीरे धीरे सामाजिकता का विकास होने पर वस्तुओं का लेन-देन करना सीख जाता है।

५ से ७ वर्ष तक का विकास

पांच वर्ष तक की अवस्था आने तक उनके भ्रम दूर होने लग जाते हैं और वह स्पष्ट रूप से वस्तुओं और रिश्तों को पहचानने लगते हैं।

उदाहरण के लिए –

गुड़िया या कार को बालक अपना सामान समझता है और उनसे बातें करता है; इस अवस्था में बालक मुख्यतया आत्मा केंद्रीय होता है।

३. मूर्त क्रियात्मक अवस्था (concrete operational stage)

इसकी अवधि सात वर्ष से ग्यारह वर्ष तक होती है; बालक में अब वस्तुओं को पहचानने का विकास होने लगता है अर्थार्थ हो जाता है।

चिंतन अब तार्किक होना प्रारम्भ हो जाता है और बालक वस्तुओं को वजन, दूरी से माप और समझ सकता है।

११ वर्ष कि अवस्था तक आते आते बालक का मानसिक विकास पूरी तरह विकसित हो जाता है।

४. औपचारिक संक्रियात्मक विकास की अवस्था (formal operational stage)-

इस अवस्था के दौरान बालक में सभी साम्प्रयत्यों का ज्ञान विकसित हो जाता है; और अब बालक भली प्रकार सोच विचार कर सकता है।

भाषा से सम्बंधित योग्यता पूरी तरह विकसित हो जाती जाती है। अब रटने कि योग्यता के स्थान पर स्मरण शक्ति विकसित हो जाती है।

बालक सोचने समझने, तर्क करने, कल्पना करने, परिक्षण करने आदि के प्रयोग में सक्षम हो जाता है।

संज्ञानात्मक विकास के क्षेत्र निम्न प्रकार से है:

1. संवेदना और प्रत्यक्षीकरण:

इसके मुताबिक बालक पहला ज्ञान ज्ञानेन्द्रिओं के द्वारा प्राप्त करता है; ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त ज्ञान को अनुभूति संवेदना कहा जाता है।

2. स्मिर्ति

बालक में स्मरण शक्ति, मानसिक विकास के लिए आवश्यक है; शिशुअवस्था में स्मिर्ति अल्पकालीन होती है जो बड़े होने पर दीर्घकालीन स्मिर्ति में बदल जाती है।

3. भाषा-

भाषा का सीधा सम्बन्ध मानसिक विकास से है; आपने देखा होगा कि बालक पहले अस्पष्ट स्वर निकालता है तथा बाद में सभी स्वरों को स्पष्ट रूप से निकालने लगता है।

4. कल्पना एवं तर्क शक्ति:

जिस प्रकार बालक कि विचार शक्ति बढ़ती जाती है उसमे कल्पना और तर्क शक्ति का विकास हो जाता है।

संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत की शैक्षिक उपयोगिताएँ

प्याजे ने व्यक्तिगत खोज पर अधिक बल दिया है। अतः शिक्षा में इस विधि का उपयोग कर अचे तरीके से उद्देशो को प्राप्त किया जा सकता है।

इससे ये भी ज्ञात होता है कि बालक कि अवस्था के अनुसार पाठय विधियों का चयन किया जाना कितना जरूरी है।

विषयानुसार उपयुक्त विधियों का प्रयोग करके दी गयी शिक्षा अत्यंत प्रभावी होगी।

पाठ्यक्रम का नियोजन करना और सही ढंग से उसका उपयोग करना बहुत महत्वपूर्ण होता है।

पियाजे हमेशा बालक केंद्रित शिक्षा के हितमें थे तथा शिक्षा में बालको कि भूमिका ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए। ।

बालकों में शिक्षा के प्रति रोचकता उत्पन्न की जनि चाहिए ताकि शिक्षा का स्तर सुधारा जा सके।

निष्कर्ष-

इस सिद्धांत के अनुसार ये कहा जा सकता है कि मानसिक विकास का प्रभाव बच्चो की जिंदगी के हर पहलू या क्षेत्र पर पड़ता है।

मानसिक विकास हमेशा छात्रों की इच्छा शक्ति और वातावरण पर भी निर्भर होता है और उसका प्रभाव भी पड़ता है।

वातावरण के साथ समायोजन करना संगठन का ही परिणाम है।

संगठन व्यक्ति एवं वातावरण के संबंध को आंतरिक रूप से प्रभावित करता है। अनुकूलन बाह्य रूप से प्रभावित करता है।

To download this as a PDF, join us on Telegram.

Want to buy more lesson plans? Visit our online store, Click Here!

Order lesson plan files with group of tutors

Have some doubts? WhatsApp us here.

See all B.Ed Assignments here

We hope that this article has been beneficial for you. If you have any quarry or questions regarding the content on our website, feel free to contact us here.

हर तरह की Updates के लिए, हमसे अभी हमारे सोशल मीडिया हैंडल्स पर जुड़ें-

Have some doubts? WhatsApp us Here!

To download other lesson plans PDF, join us on Telegram.

See all B.Ed Assignments here

We hope that this article has been beneficial for you. If you have any quarry or questions regarding the content on our website, feel free to contact us here.

Useful books,

B.Ed Files,

Lesson Plans,

Trending articles,

If you also wish to contribute and help our readers find all the stuff at a single place, feel free to send your notes/assignments/PPTs/PDF notes/Files/Lesson Plans, etc., on our WhatsApp number +91-8920650472 Or by mailing us at write2groupoftutors@gmail.com, we will give full credits to you for your kind contribution.

You can also work with us as a team by simply contacting us Here.

संज्ञानात्मक विकास notes, संज्ञानात्मक विकास piaget theory, संज्ञानात्मक विकास piaget, संज्ञानात्मक विकास theory, संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development), संज्ञानात्मक विकास Notes CTET, संज्ञानात्मक विकास Notes UPTET, संज्ञानात्मक विकास Notes KTET, संज्ञानात्मक विकास notes DU, संज्ञानात्मक विकास Notes CRSU, संज्ञानात्मक विकास notes in Hindi, संज्ञानात्मक विकास notes Group Of Tutors, संज्ञानात्मक विकास, संज्ञानात्मक विकास, संज्ञानात्मक विकास, संज्ञानात्मक विकास, संज्ञानात्मक विकास,

error: Content is protected !!