सूचना तथा ज्ञान में अंतर। (Difference Between Information and Knowledge)

Share with friends
सूचना तथा ज्ञान

सूचना तथा ज्ञान (Information and Knowledge) दोनों को कई बार हम एक ही समझ लेते हैं। लेकिन सूचना तथा ज्ञान (Information and Knowledge) दोनों अलग-अलग होते हैं। इस आर्टिकल में हम सूचना तथा ज्ञान (Information and Knowledge) के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे। और ये भी जानेंगे की आखिर सूचना (Information) किस तरह ज्ञान (Knowledge) से अलग है। हम सूचना तथा ज्ञान के अंतरों की भी यहाँ चर्चा करेंगे।

……………………..

Content in this article

Get regular updates, follow us on Telegram!

ज्ञान तथा सूचना के वारे में आप क्या जानते हैं? सूचना तथा ज्ञान के सम्बन्ध का वर्णन कीजिये। सूचना तथा ज्ञान में अंतर स्पष्ट कीजिये।

What do you know about information and knowledge? Describe the relationship between information and knowledge. What is the difference between information and knowledge?

इनफार्मेशन या सूचना का अर्थ:

  • सूचना (Information) शब्द का अर्थ किसी को कोई बात बताना, कहना, समाचार आदि सुनाना ।
  • ‘सूचना’ शब्द को अंग्रेजी में इनफार्मेशन कहते हैं।
  • इनफार्मेशन शब्द फॉर्मेटिया अथवा फोरम शब्द से बना हुआ है।
  • अर्थात किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति से संबंधित तथ्यों को सूचना कहते हैं।
  • सूचना उद्देश्यपूर्ण होती है और यह संचार(संवाद) को विचारपूर्ण बनाने में मदद करती है।
  • यह खुद में संपूर्ण नहीं होती और एक अंश/ खण्ड के रूप में होती है।

सूचना के संपूर्ण ना होने का मतलब ऐसे समझा जा सकता है कि-

  • बच्चों को आरंभिक दिनों में जो शिक्षा दी जाती है वो एक सूचना ही होती है।
  • उनको हर बात को रटवा दिया जाता है।
  • यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि बच्चों में शिक्षा कि सिर्फ सूचना पायी जाती है।
  • लेकिन जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता है तो उस सूचना का इस्तेमाल करके अपने ज्ञान कि वृद्धि करता है।

B.Ed फाइल्स के लिए यहाँ क्लिक करें।

अन्य शब्दों में, हम सभी प्राणियों के विचारों को प्रकट करना ही सूचना है। हम सब सामाजिक प्राणी हैं और मानवीय गतिविधियों से सीधे जुड़े रहते हैं। हमें किसी चीज की आवश्यकता होने पर उसकी शोध की जाती है। जिससे नई परिकल्पनायें जन्म लेती हैं। इन परिकल्पनाओं को तान्त्रिकाओं के माध्यम से मस्तिष्क तक ले जाया जाता है।

मस्तिष्क उन परिकल्पनाओं को विचार का रूप देता है। इस प्रकार नये तथ्य उत्पन्न होते हैं। इन्ही तथ्यों को सूचनाओं के नाम से जाना जाता है। जब हम एक दूसरे से बातें भी करते हैं तो सूचना उत्पन्न होती है। अतः जब मनुष्य विचार करता है तो उसके मस्तिष्क में अनेक सूचनायें इकट्ठी हो जाती हैं। इन्ही सूचनाओं को विभिन्न प्रकार से प्रकट किया जा सकता है। जैसे मौखिक, संकेतों द्वारा, प्रलेखीय स्वरूपों द्वारा, मीडिया द्वारा आदि।

सूचना की परिभाषाएं

हाफमैन के अनुसार– सूचना वक्तव्यों, तथ्यों अथवा आकृतियों का संकलन होती है।

रोवली तथा टोनर के अनुसार, ‘‘सूचना वह आंकड़े हैं जो व्यक्तियों के मध्य से प्रेषित हो सके तथा प्रत्येक व्यक्ति उसका प्रयोग कर सके।’’

जे बीकर ने कहा है कि, सूचना किसी विषय से सम्बंधित तथ्यों को कहते हैं।

एन बैल्किन के अनुसार — सूचना उसे कहते हैं जिसमें आकार को परिवर्तित करने की क्षमता होती है।

जे एच शेर्रा (J.H. Sherra) के अनुसार, ‘‘सूचना का उपयोग जिस रूप में जीव विज्ञान व ग्रन्थावली में करते हैं, उसे तथ्य कहते हैं। यह एक उत्तेजना है, जिसे हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा प्रस्तुत करते हैं। यह एक प्रकार का तथ्य हो सकता है अथवा तथ्यों का सम्पूर्ण समूह हो सकता है तथापि (यह इकाइ होता है), यह विचारधारा की एक ईकाई होता है।’’

बर्नर ने कहा है कि, बाह्य जगत के साथ जो विनियम होता है तथा जब हम इसके साथ सामंजस्य स्थापित करते हैं और अप ने सामंजस्य के जिस पर अनुभव करते हैं, उसकी विषय वस्तु के नाम को सूचना कहते हैं। सक्रियता एवं प्रभावशाली ढंग से जीवन का अभिप्रायही सूचना के साथ जीना है।

हॉफ मैन के विचारों में, ‘‘सूचना वक्तव्यों, तथ्यों तथा आकृतियों का संकलन होता है।’’

बेल के अनुसार, ‘‘सूचना समचारों, तथ्यों, आकडों, प्रतिवेदनों, अधिनियमों कर सहिताओं, न्यायिक निर्णयों, प्रस्तावों और इसी तरह की अन्य चीजों से सम्बन्धित होती हैं।’’

ऊपर दी गईं परिभाषाओं से हमें ज्ञात होता है कि आखिर सूचना क्या होती है। सूचना की कुछ विशेषताएं भी होती हैं जो निम्न हैं-

सूचना की विशेषताएं(Characteristics of Information) :

हर एक सूचना का एक मूल्य होता है। सूचना के इस मूल्य को कई कारक प्रभावित करते हैं। यही कारक सूचना की विशेषताओं के नाम से जाने जाते हैं।

सूचना के करक (विशेषताएं) निम्न हैं-

1. उपयुक्त (Accuracy):

कभी कभी अफवाहों को ही सूचना मान लिया जाता है जो गलत है। सूचना बिलकुल सही होनी चाहिए। गलत सूचना या अफवाह किसी को भी हानि पंहुचा सकती है।

2. उपलब्धता (Availability):

सूचना का उपलब्ध हो पाना बेहद जरुरी है। सूचना का अभाव ही अफवाहों को जन्म देता है।

3. समयबद्धता (Timelines):

सूचना जितनी जल्दी उपलब्ध हो उतनी ही अच्छी होती है। वरना मनुष्य गलत सूचना के सहारे ही जीने लगता है जो की ठीक नहीं है।

4. सम्पूर्णता (Completeness):

आधी-अधूरी सूचना हानिकारक होती है। एक कहावत के अनुसार “नीम हकीम, खतरे में जान” मुहावरे के जरिये ये ही बताया गया है कि सूचना का सही होना कितना आवश्यक है।

5. प्रस्तुतीकरण (Presentation):

सूचन भले ही संपूर्ण हो और उसको अच्छी तरह से प्रस्तुत ना किया जाए तो उसके कुछ मायने नहीं रह जाते। सूचना को अर्थपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करके अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

सूचना के स्तर (Levels of Information):

सूचनाएं कभी भी एक व्यक्ति या चंद व्यक्तिओं से सम्बंधित नहीं हो सकतीं। अर्थात सूचना अलग व्यक्तिओं, देशों आदि से सम्बंधित हो सकती है। सूचनाएं अलग अलग स्तर पर होती हैं। किसी भी संगठन में अलग-अलग स्तर पर सूचनाओं का आदान-प्रदान हो सकता है। सूचना के कुछ स्तर निचे दिए गए हैं-

Unable to make B.Ed Files? Order yours NOW!

1. अंतर्राष्ट्रीय सूचना

  • बड़ी-बड़ी कम्पनियां देश-विदेश में व्यापार करती हैं।
  • उन्हें अपना व्यापार स्थापित करने के लिए अलग-अलग देशों के लोगों और उनके स्वाद की जानकारियों की जरुरत होती है।
  • सूचनाएं उनको अलग अलग स्त्रोतों से मिल जाती हैं।
  • और वो इन सूचनाओं का इस्तेमाल करते हैं।
  • विश्वविद्यालयों, बड़े व्यापारियों और शैक्षिक संस्थानों द्वारा ये सूचनाएं इस्तेमाल की जाती हैं।

2. राष्ट्रीय सूचना

  • राष्ट्रीय सूचना एक देश की सीमाओं में बेहद महत्त्वपूर्ण होती हैं।
  • राष्ट्रीय सूचना के स्त्रोत हैं – शैक्षिक या व्यापारिक मैगज़ीन, टी वी पर आधारित प्रोग्राम, अनेक प्रकार के रिव्यूस या समाचार पत्रों में प्रकाशित लेख आदि।

3. कॉर्पोरेट सूचना

  • इस प्रकार की सूचना संगठनों आदि के वारे में होती है।
  • इस सूचना को निवेशकों और विद्यार्थिओं तक पहुंचाया जाता है।

4. डिपार्टमेंटल सूचना

  • किसी भी व्यवसाय या संगठन को सफल बनाने के लिए उसमें अनेक योजनाएं बनायीं जाती हैं।
  • इन योजनाओं को फिर व्यवसाय के विभागों में बाँट दिया जाता है।
  • इस तरह वह व्यवसाय अपने लक्ष्यों को पूरा कर पाते हैं।

5. व्यक्तिगत सूचना

  • इन सूचना में संगठन या व्यवसाय के अंदर काम कर रहे स्टाफ या कर्मचारियों की सूचना शामिल है।
  • इसमें व्यक्ति का अनुभव, वेतन का स्तर, वैवाहिक स्तर आदि शामिल हैं।
ज्ञान क्या है

ज्ञान क्या है?

  • ज्ञान शब्द ज्ञ धातु से बना है जिसका मतलब है जानना।
  • अन्य शब्दों में कहा जाए तो वस्तु जैसी है उसका अनुभव या बोध होना ही ज्ञान है।
  • आज हम जो बातें जानते हैं उन्हें ही ज्ञान समझ लेते हैं। ज्ञान की श्रेणी इस सब से अलग है।
  • ज्ञान को बहुमूल्य रत्नों से भी अधिक मूल्यवान कहा गया है।
  • ज्ञान का शाब्दिक अर्थ किसी भी विषय को पूरी तरह से समझना, उसका पूरा अनुभव करना और समय आने पर उसका उचित रूप से प्रयोग करना है।

Are you a teacher? Join us as a Home Tutor!

अर्थात ज्ञान से अभिप्राय किसी भी विषय को पूरी तरह से समझने, उसका अनुभव करने तथा समय आने पर उसका प्रयोग करने से है। ज्ञान एक प्रकार का विश्वास है जिसे सत्य के रूप में स्वीकार किया गया है। ज्ञान हर प्रकार से अर्जित किया जा सकता है जैसे कि सुनकर, या देखकर, समझकर या अनुभवों के द्वारा। ज्ञान से मतलब किसी भी चीज या वस्तु के बारे में सही या पूर्ण जानकारी से ही है।

प्लेटो के अनुसार– “विचारों की दैवीय व्यवस्था और आत्मा-परमात्मा के स्वरुप को जानना ही सच्चा ज्ञान है।”

शब्द कोष में भी ज्ञान के अनेक अर्थ बताये गए हैं जो इस प्रकार हैं –

1. सूचना के रूप में ज्ञान:

किसी भी प्रकार की जानकारी या सूचना जो पूर्ण हो वह ज्ञान है।

2. अधिगम के रूप में ज्ञान:

स्वयं के अनुभवों तथा प्रशिक्षण के द्वारा प्राप्त किया गया अधिगम ज्ञान कहलाता है।

3. निश्चित विशवास:

अपने अनुभवों और चिंतन के आधार पर व्यक्ति के जो विश्वास बन जाते हैं, वही ज्ञान है।

4. ज्ञात

जो ज्ञात है अर्थात जो जाना हुआ है, वही ज्ञान है।

5. प्रबोधन

इसके अनुसार जिसका बोध हो गया हो, वही ज्ञान है।

अधोलिखित के अनुसार कहा जा सकता है कि जीवन, संसार, आत्मा, परमात्मा, आदि के विषय में जो ज्ञात है, प्रकाशित है, सूचित है तथा अपने अध्यन और अनुभवों के आधार पर जो विश्वास हमने बनाये हैं वह सब ज्ञान हैं।

मनुष्य विचारशील प्राणी है। मनुष्य के मनन करने पर उसके पूर्व विश्वास टूट जाते हैं और नए विश्वास बनने लगते हैं। अब वह जीवन के बारे में नए निष्कर्ष निकालने लगता है। इस तरह बने हुए नए विश्वास और निष्कर्ष भी ज्ञान हैं।

ज्ञान की प्रकृति (स्वरुप)

Knowledge अथवा ज्ञान की प्रकृति को ज्ञान की विशेषताओं के माध्यम से समझना आसान है। ज्ञान की विशेषताओं को समझने के लिए ज्ञान के सिद्धान्त भी पता होने जरूरी हैं।

ज्ञान की विशेषताएँ व प्रकृति इस प्रकार हैं-

  • ज्ञान व्यक्ति के अनुभवों का परिणाम है।
  • बुद्धि को ज्ञान का स्त्रोत कहा गया है। बुद्धि द्वारा ही इसको को प्राप्त किया जा सकता है।
  • ज्ञानेन्द्रियाँ ही नॉलेज प्राप्ति का साधन होती हैं।
  • यह व्यक्ति के अंतःकरण को प्रकाशित करता है।
  • दरअसल इसका संबंध व्यक्ति द्वारा अपने व दूसरों के अनुभवों के आधार पर विकसित विश्वासों के साथ होता है।
  • विभिन्न विषयों से संबंधित सूचनाएं या जानकारियां भी ज्ञान का अभिन्न अंग होती हैं।
  • ज्ञान कभी भी समाप्त नहीं हो सकता।
  • यह सत्य तक पहुँचने का एक रास्ता या साधन है।
  • ज्ञान दरअसल धन की तरह होता है। यह जितना एक मनुष्य को प्राप्त होता है, उतना ही ज्यादा पाने की इच्छा करता है।
  • इसकी कोई सीमा नहीं होती।
  • यह हमेशा बढ़ता ही रहता है, अतः यह अचानक से नहीं मिल जाता।

ज्ञान तथा सूचना में अंतर

ज्ञान

सूचना

1. ज्ञान एक विस्तृत अवधारणा है।1. सूचना ज्ञान के सामान विस्तृत अवधारणा नहीं है अथवा संक्रीर्ण अवधारणा है।
2. ज्ञान सिर्फ आंकड़े और तथ्य नहीं है।2. सूचना में सिर्फ आंकड़े और तथ्य होते हैं।
3. ज्ञान के अंतर्गत तथ्यों कि जानकारी को अर्थपूर्ण स्तर तक जानना आवश्यक है।3. सूचना के अंतर्गत तथ्यों कि जानकारी आवश्यक नहीं है।
4. ज्ञान प्राप्ति कि प्रकिर्या में मानसिक परिवर्तन और मानसिक वृद्धि होती है।4. सूचना प्राप्ति में किसी भी प्रकार के मानसिक परिवर्तन तथा मानसिक वृद्धि नहीं होती।

यह भी पढ़ें-

पुस्तकें,

B.Ed फाइल्स,

For regular updates, follow us on Telegram, Click Here!

Leave a Comment

error: Content is protected !!